व्यथा

अमित गुप्ता द्वारा दिहाड़ी मज़दूरों की व्यथा पर लिखित कुछ पंक्तियाँ ….

जान तेरी बड़ी ही सस्ती है,
जहाँ पैदा हुआ वो गरीबों की बस्ती है |
घर जाने को ना बची कोई कश्ती है, 
रहने को मिल जाए ठिकाना ऐसी ना तू हस्ती है |

कभी कभी कारख़ानों में नज़र घुमाता हूँ, 
मजदूर मैं उ.प्र. बिहार का ही पाता हूँ |
दिन की रोजी से बच्चों की भूख मिटाता हूँ, 
कह भी ना सकता तू कि मैं देश की अर्थव्यवस्था चलाता हूँ |

समझ न आ रहा क्या करूँ मेरे साईं !! 
आगे भुखमरी का कुआं पीछे कोरोना जैसी खाई |
जीवन चलाने को ना बची कोई कमाई, 
ऐ मौत थोड़ा रुक जा मेरे भाई… 
दम टूटे तो मिल जाए बस मेरा गाँव और घर की परछाई |

Pic taken from google

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